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Monday, January 30, 2017

Of Rani Padmawati and Sanjay Leela Bhanshali

भंसाली जी के साथ किसी भलमानुष ने बदतमीजी कर दी, या जैसा उन महानुभाव का कहना था इतिहास की सही पाठ पढाई | मैं तो हैरान हूँ के जोधा-अकबर और बाजीराव-मस्तानी जैसी ऐतिहासिक कहानियो को सुनहरे परदे पर लाने वाले को इतिहास के पाठ की ज़रुरत कैसे पड़ गयी | फिर याद आया के संजय लीला भंसाली फ़िल्मकार है इतिहासकार नहीं | हो सकता है के जिस रानी पद्मावती को अल्लाउद्दीन खिलजी से अपनी रक्षा के लिए जौहर करना पड़ा, जिस अतुल्य जौहर की गाथा को मलिक मोहम्मद जायसी ने अपनी लेखनी से अमर कर दिया, उस रानी को खिलजी के साथ काल्पनिक प्रेमालाप दिखना भंसाली जी की मज़बूरी हो| आखिर जिस फिल्म में दीपिका और रणवीर हों और उनके बीच प्रेम प्रसंग न हो, ये तो ५०० रूपये देकर मल्टीप्लेक्स में जाकर फिल्म देखने वाले दर्शक के साथ तो धोखाधड़ी होगी | अब उसे इतिहास या सच्चाई से क्या लेना देना | कहानी सच्ची हो या झूठी, चाहे फिल्मो का नायक असली ज़िन्दगी मे सच्चाई और न्याय की परखाचियां क्यों न उड़ा रहा हो दर्शक को तो मनोरंजन चाहिए |

शाहिद कपूर ये बदतमीजी सही ना गयी, आखिर अपने निर्देशक की बेइज़्ज़ती कैसे कोई हीरो सह सकता है | उन्हें उस समय भंसाली के साथ नहीं होने और इस अश्लीलता को अंजाम देने वाले को अच्छा सबक न सिखाने का मलाल रह गया | इस पर किसी ने चुटकी ले ली के जब कश्मीर में राष्ट्र गान और राष्ट्र ध्वज को लेकर कुछ गुंडाईयो ने शाहिद के सामने बवाल किया था तब उनको कोई सबक सिखाना तो दूर, ये वहां से फ़ौरन निकल लिए थे | सोशल मीडिया की यादाश्त बड़ी तगड़ी है, आपकी हर बात, आपका हरेक वाकया हमेशा के लिए अंकित हो जाता है | लेकिन चुटकी लेने वाले सज्जन को कोई ये समझाए के फ़िल्मी हीरो के लिए निर्देशक की इज़्ज़त और अपनी जान ज्यादा मायने रखने रखती है न के राष्ट्रध्वज की | अब वो करोड़ो कमाने वाला, लाखो दिलोजान पे राज करने वाला हीरो है, हज़ारो की पगार पर अपनी जान बाज़ी पर लगाने वाला सैनिक थोड़े ही |

अब रानी पद्मावती के सम्मान की बात जयपुर से हीं उठनी उतनी हीं आवश्यक है, जितनी दिल्ली के गलियारों से भ्रष्टाचार की बात | आखिर जहां हरेक १००० लड़को पे सिर्फ ८८३ लडकिया हैं, वही तो लड़कियों के सम्मान की महत्त्ता समझेंगे | इस बात को समझना और भी आवश्यक है के महिलाओ की इज़्ज़त उनके घर में हो या न हो लेकिन उनके घर में हीं होने पर निर्भर है | आखिर उनकी इज़्ज़त की ज़रुरत तो उनके दहलीज के बाहर निकलने के बाद हीं पता चलती है | अब ऐसे माहौल में अगर कोई महिला भ्रूण हत्या कर उन अबला महिलाओ को ऐसी संभावी पीड़ा से बचा रहा है तो वो रानी पद्मावती के सम्मान पे हो रहे इस आघात पर आवाज़ क्यों न उठाये |

हमारे कुछ मित्र भी बड़े आहत है| पैसो की लालच में फ़िल्मकार जानबूझ कर ऐसे फिल्म बना रहे है, हमारे संस्क़ृति और इतिहास का मज़्ज़ाक़ उड़ा रहे है, उनको ऐसे सबक सिखाना जायज़ है | धर्मनिरपेक्ष और उदारता की झूठी चादर ओढ़ ऐसे घृणित कार्य करने वालो को सच्चाई से अवगत करवाना और सच्चाई की ताकत का एहसास भी आवश्यक है | चाहे सच जो भी हो, फिल्म में वह प्रसंग हो न हो वो तो फिल्म आने पर हीं पता चलेगा लेकिन तब तक अगर हम उड़ती बताओ को सच मान कर उस पर अपनी प्रतिकिया न दे तो क्या | आखिर क्रांति सेना जैसे लोग भी तो समाज में क्रांति लाने के लिए हीं हैं, अब क्रांति हो या आग लगे |

मेरी मानो तो जब तक महिलाओ के सम्मान का ठेका हम पुरुष लेते रहेंगे बस आग हीं लगेगी | आखिर ठेका तो अब भी हमारा हीं है | पहले महिलाओ का ठेका अब उनकी सम्मान का ठेका | वह जीन्स पहने या नहीं, वो मंदिर जाए या नहीं, जब हमें हीं सब संयमित और सुरक्षित करना है तो रानी जी के सम्मान का ठेका क्यों नहीं |